Saturday, September 20, 2008

जाने क्यों? मेरी अनकही पार्ट-1


आप किसी न किसी के लिए अपनी खुशियाँ दरकिनार करते होंगे। किसके लिए? क्या उस खास के लिए आपकी खुशियाँ की कोई कीमत है? मुझे तो लगता है कि जिनके लिए आप अपनी खुशियों का गला घोंटते हैं, वे उसे कुछ और कहते हैं.... अहसान। अगर आप किसी बड़े को खुशी देने की कोशिश करिए तो आपका छोटापन राह में खड़ा हो अर्थ का अनर्थ कर देता है। या फ़िर ये वक्त कि बात होती है। एक समय के बाद आपके दर्द सिर्फ़ आप पर छोड़ दिए जाते हैं। यही रीत है इस दुनिया की, मुझे तो यही लगता है की ये दुनिया दिखावा पसंद करती है। किसी को आपके दर्द का एहसास तब तक नही होता है जब तक उन्हें हम अपने घाव न दिखाएं। जब मै ये कहता हूँ तो रगों में बहता खून सर्द होने लगता है, जमने लगता है। जाने क्यूँ? पर क्यों हम किसी को ग़लत समझते हैं...? जरा सोचिये...क्या ये सही नही है? क्या जरुरी है कि हमेशा अपनी मोहब्बत दिखाई जाए? उन खास लोगों के लिए इज्जत का नजराना पेश किया जाए? बार बार सबके सामने एहसासों को बाजारू बना दिया जाए? हर कोई एक सा नही होता। तो क्या जरुरी है ख़ुद को खोलना?
... मुझे तो कभी कभी ऐसा ही लगता है। आपको?

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